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गमों में डूबे तो फिर जगमगा के निकले हैं ... यहाँ डूबे थे ... बड़ी दूर जा के निकले हैं

गमों में डूबे तो फिर जगमगा के निकले हैं ... यहाँ डूबे थे ... बड़ी दूर जा के निकले हैं .... तेरी बाहों में बड़े प्यार से आये थे मगर .. तेरे पंजो से बहुत छटपटा के निकले हैं ... तूने भी दिल को दुखने की इन्तहा कर दी... हम भी महफ़िल से मगर मुस्कुरा के निकले हैं .. कई लोगो से मेरी नौकरी की बात हुई ... बहुत से काम तो हाथो में आ के निकले हैं ... मेरे ही ज़ब्त ने बेचैन किया है तुझको .. ये तेरे आंसू मुझे आजमा के निकले हैं ... बड़े तैराक हैं ये मैंने खुद भी देखा है ... यहाँ कूदे थे .. बहुत दूर जा के निकले हैं .. धड़कने रुक गयी , दम भी निकल गया मेरा.. सभी अरमान तेरे पास आ के निकले हैं .. हमने हर नौकरी बर्बाद होके छोड़ी है ... सबको लगता है के पैसा कमा के निकले हैं .. ऐसे वैसो को भी दिल में बसा लिया ''सतलज' बहुत से लोग तो बातें बना के निकले हैं ...

मोहब्बत का मेरे सफर आख़िरी है

मोहब्बत का मेरे सफर आख़िरी है, ये कागज, कलम ये गजल आख़िरी है मैं फिर ना मिलूंगी कहीं ढूंढ लेना तेरे दर्द का ये असर आख़िरी है…!!

तमाम गाँव तेरे भोलपन पे हँसता है

मेरा क़लम मेरे जज़्बात माँगने वाले मुझे न माँग मेरा हाथ माँगने वाले ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे ये सब थे भीक मेरे साथ माँगने वाले तमाम गाँव तेरे भोलपन पे हँसता है धुएँ के अब्र से बरसात माँगने वाले नहीं है सहल उसे काट लेना आँखों में कुछ और माँग मेरी रात माँगने वाले कभी बसंत में प्यासी जड़ों की चीख़ भी सुन लुटे शजर से हरे पात माँगने वाले तू अपने दश्त में प्यासा मरे तो बेहतर है समंदरों से इनायात माँगने वाले

तेरी एक हसी पे ये दिल कुर्बान कर जाओ

तेरी एक हसी पे ये दिल कुर्बान कर जाओ , ऐतराज़ न हो अगर तो तेरा दिल चुरा ले जाओ , न बहने दू कभी इन आखो से आंसू , तू कहे तो तेरे सारे सितम सह जाओ . हँसता हुआ रखु तेरे लबो को हमेशा , चूमकर जिन्हें वोह प्यारी मुस्कान दे जाओ , सीने से लगा के रखु तुम्हे , मनन तो करता है तुझमे समां जाऊ . सुनता ही रहू तुम्हारी धडकनों को , और अपने दिल की हर बात कह जाऊ , गम को कभी करीब न आने दू , और तुम्हे ज़िन्दगी की खुशिया तमाम दे जाओ

ज्यादा मिठाई अच्छी नहीं लगती

ज्यादा मिठाई अच्छी नहीं लगती  झूठी वाहवाही अच्छी नहीं लगती सच, हक में .. फायदेमंद भी, पर  हमें कड़वी दवाई अच्छी नहीं लगती  तुझे ही हो मुबारक़ बुज़ुर्गों की हवेली  ये दीवार मेरे भाई अच्छी नहीं लगती  मोहब्बत में तकरार लाज़मी है मगर  पर अब ये लड़ाई अच्छी नहीं लगती लुत्फ़ आता है हमें भी यूँ तो पर हरदम बुराई अच्छी नहीं लगती किसे है गुरेज़ ठहाकों कहकहों से पर जगहंसाई अच्छी नहीं लगती कुबूल है तेरी सारी बेवफ़ाइयां, ऐ दोस्त तेरे मुंह से सफाई अच्छी नहीं लगती चुरा ली नींदे नरम पलंग ने, पर क्या करें घर में अब चारपाई अच्छी नहीं लगती नज़र न आये मेरे अपने जहाँ से हमें वो उंचाई अच्छी नहीं लगती शराफत को ज़माना कमजोरी समझे इतनी अच्छाई अच्छी नहीं लगती कभी तो कीजिये सीधीसादी शायरी हरदम ये गहराई अच्छी नहीं लगती दुश्मनों को हैं कुबूल तारीफ़ यूं तो पर दोस्तों को बड़ाई अच्छी नहीं लगती तेरी बज़्म नवाज़ती है ‘खुलूस-ओ-दाद’ से किसको ये कमाई अच्छी नहीं लगती चल दिए पढ़कर, न लाइक न कमेंट आपकी ये कोताही अच्छी नहीं लगती फ़क़त इसलिए उसकी आदतें बुरी है ‘ विक्रम ’ को पारसाई अच्छी नहीं लगती

तेरी निगाह के जादू बिखरते जाते हैं

तेरी निगाह के जादू बिखरते जाते हैं जो ज़ख़्म दिल को मिलले वो भरते जाते हैं तेरे बगैर वो दिन भी गुजर गए आखिर तेरे बगैर ये दिन भी गुजरते जाते हैं

महफील भी रोयेगी, हर दिल भी रोयेगा

महफील भी रोयेगी, हर दिल भी रोयेगा , ङुबी जो मेरी कस्ती तो साहील भी रोयेगा , हम इतना प्यार बीखेर देगे इस दुनीया मे के, मेरी मौत पे मेरा कातील भी रोयेगा……!!